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शनिवार, 30 अप्रैल 2011

कुछ त्रिपदा अगीत....डा श्याम गुप्त

( त्रिपदा अगीत---अगीत विधा कविता का एक छंद  है--- तीन पंक्तियाँ , प्रत्येक में १६-१६ मात्राएँ , तुकांत बंधन नहीं )

मिटा सके भूखे की हसरत,
दो रोटी भी उपलब्ध नहीं ;
क्या करोगे ढूंढ कर अमृत |

ज़िंदगी की डोर लम्बी है,
थामना भी आना चाहिए;
हंसाने का बहाना चाहिए |

बहस तत्व ज्ञान के लिए है,
 झगड़े मिटाने के लिए है;
न कि मारा मारी के लिए |

प्रीति-प्यार में नया नहीं कुछ ,
वही पुराना किस्सा यारो;
लगता शाश्वत नया नया सा |

कल तुमने जो हंसी हंसी में,
बातों बातों में कह डाला ;
अपना ही वो अफसाना था |

दीवान लिखना चाहते थे,
शोखियों पर आपकी हम तो;
अदाओं में उलझे रह गए |

2 टिप्‍पणियां:

  1. Very Nice ..plz visit my blog http://yogeshamana.blogspot.com/

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  2. धन्यवाद योगेश जी....आपकी शायरी ...अच्छे ज़ज़्वात हैं..

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